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भारत का डेटा प्राइवेसी कानून (DPDP Act 2023): आम यूजर को क्या जानना चाहिए

भारत का डेटा प्राइवेसी कानून (DPDP Act 2023): आम यूजर को क्या जानना चाहिए

आज के जमाने में हम सब की ज़िंदगी बिना इंटरनेट के सोचना भी मुश्किल है। सुबह उठते ही मोबाइल चेक करना, सोशल मीडिया पर स्क्रॉल करना, ऑनलाइन शॉपिंग करना, बैंकिंग से लेकर सरकारी काम तक-हर जगह हम अपना पर्सनल डेटा इस्तेमाल करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह डेटा कितना सुरक्षित है?

क्या कोई कंपनी आपकी जानकारी का गलत इस्तेमाल कर सकती है? और अगर आपका डेटा लीक हो जाए, तो आपकी सुरक्षा कौन करेगा?

इन्हीं सवालों का जवाब है भारत का नया डेटा प्राइवेसी कानून, जिसे डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2023 (DPDP Act 2023) कहा जाता है।

यह कानून अगस्त 2023 में पास हुआ था, लेकिन अब 2026 में इसके नियमों को लेकर तस्वीर पूरी तरह साफ हो चुकी है। दरअसल, डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन रूल्स 2025 को 13 नवंबर 2025 को नोटिफाई किया गया, जिससे यह तय हो गया कि यह कानून ज़मीन पर कैसे लागू होगा। फरवरी 2026 तक, इसके कई अहम प्रावधान लागू भी हो चुके हैं।

DPDP Act 2023 आम यूजर को उसके डेटा पर अधिकार देता है, कंपनियों को ज़िम्मेदार बनाता है और डेटा चोरी या दुरुपयोग करने पर कड़ी सज़ा का प्रावधान करता है। आसान शब्दों में कहें तो अब आपका डेटा “कंपनियों की मर्जी” पर नहीं, बल्कि आपकी अनुमति पर इस्तेमाल होगा।

इस ब्लॉग पोस्ट में हम DPDP Act 2023 को बिल्कुल सरल भाषा में समझेंगे।
हम जानेंगे:

  • यह कानून आखिर है क्या
  • आम यूजर को इसमें कौन-कौन से अधिकार मिलते हैं
  • कंपनियों की क्या ज़िम्मेदारियां तय की गई हैं
  • और 2026 में इसमें क्या नए अपडेट आए हैं

अगर आप फेसबुक, गूगल, अमेज़न, या किसी भी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते हैं, तो यह जानकारी आपके लिए बेहद ज़रूरी है। यह लेख थोड़ा लम्बा है, ताकि आपको आधी-अधूरी नहीं, बल्कि पूरी और साफ जानकारी मिल सके।

DPDP Act 2023 का इतिहास और पृष्ठभूमि

भारत में डेटा प्राइवेसी कोई नया मुद्दा नहीं है। यह चर्चा कई सालों से चल रही थी, लेकिन 2017 का सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला (पुट्टास्वामी जजमेंट) इस दिशा में सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ। इस फैसले में प्राइवेसी को भारत में मौलिक अधिकार घोषित किया गया।

इसके बाद सरकार ने एक मजबूत डेटा सुरक्षा कानून बनाने की प्रक्रिया शुरू की। इस दौरान कई ड्राफ्ट सामने आए- जैसे पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल 2019 और फिर डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल 2022। कई बार संशोधन हुए, बहस हुई और स्टेकहोल्डर्स से राय ली गई। आखिरकार, 9 अगस्त 2023 को यह कानून लोकसभा और राज्यसभा से पास हुआ और 11 अगस्त 2023 को राष्ट्रपति की मंजूरी के साथ यह आधिकारिक रूप से कानून बन गया।

DPDP Act 2023 भारत को यूरोपियन यूनियन के GDPR जैसे अंतरराष्ट्रीय डेटा प्राइवेसी स्टैंडर्ड्स के करीब लाता है। हालांकि, भारत की ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए इसमें कुछ खास और अलग प्रावधान भी जोड़े गए हैं-जैसे बच्चों के डेटा की अतिरिक्त सुरक्षा और कुछ मामलों में सरकारी छूट।

इसके बाद 2025 तक इस कानून के नियम तैयार करने का काम चला। 3 जनवरी 2025 को ड्राफ्ट रूल्स जारी किए गए और जनता व इंडस्ट्री से फीडबैक लिया गया। आखिरकार, 13 नवंबर 2025 को DPDP Rules 2025 को नोटिफाई कर दिया गया।

फरवरी 2026 तक, यह कानून चरणबद्ध तरीके से लागू हो रहा है।

  • पहले चरण में डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड का गठन हो चुका है
  • दूसरा चरण नवंबर 2026 में कंसेंट मैनेजर रजिस्ट्रेशन से शुरू होगा
  • और पूरी तरह लागू होना मई 2027 तक तय किया गया है

यह कानून इतना ज़रूरी क्यों है?

क्योंकि भारत में आज 80 करोड़ से ज्यादा इंटरनेट यूजर्स हैं और हर दिन करोड़ों लोगों का डेटा ऑनलाइन इस्तेमाल होता है। बिना किसी सख्त कानून के, डेटा चोरी, हैकिंग और दुरुपयोग के मामले लगातार बढ़ रहे थे। DPDP Act 2023 इन्हीं समस्याओं को रोकने और यूजर्स को सुरक्षित रखने के लिए लाया गया है।

DPDP Act 2023 क्या है? (सरल भाषा में)

DPDP Act 2023 भारत का पहला ऐसा कानून है जो खास तौर पर डिजिटल पर्सनल डेटा की सुरक्षा के लिए बनाया गया है। आसान शब्दों में कहें तो यह कानून यह तय करता है कि कोई भी कंपनी या संगठन आपका पर्सनल डेटा कैसे, क्यों और कितनी सीमा तक इस्तेमाल कर सकता है।

अब सवाल आता है- पर्सनल डेटा होता क्या है?

आपसे जुड़ी कोई भी ऐसी जानकारी जिससे आपकी पहचान हो सके, पर्सनल डेटा कहलाती है। जैसे आपका नाम, मोबाइल नंबर, ई-मेल आईडी, घर या लोकेशन की जानकारी, फोटो, आधार या फिंगरप्रिंट जैसी बायोमेट्रिक डिटेल्स-सब कुछ इसमें शामिल है।

यह भी पढ़े:- सोशल मीडिया एल्गोरिदम और लोकतंत्र: क्या हमारीसोच को कंट्रोल किया जा रहा है?

DPDP Act 2023 में इस्तेमाल होने वाले ज़रूरी टर्म्स

कानून की भाषा थोड़ी टेक्निकल लग सकती है, लेकिन इन टर्म्स को समझना बहुत आसान है:

  • डेटा प्रिंसिपल (Data Principal)

यानी आप । जिसका डेटा इस्तेमाल किया जा रहा है, वही डेटा प्रिंसिपल होता है।

  • डेटा फिड्यूशरी (Data Fiduciary)

वह कंपनी या संस्था जो आपका डेटा कलेक्ट करती है या उसका इस्तेमाल करती है।
जैसे-गूगल, फेसबुक, अमेज़न, बैंक या कोई ऐप।

  • सिग्निफिकेंट डेटा फिड्यूशरी (Significant Data Fiduciary – SDF)

वे बड़े प्लेटफॉर्म्स जो करोड़ों लोगों का डेटा संभालते हैं, जैसे सोशल मीडिया कंपनियां।
इन पर आम कंपनियों से ज़्यादा सख्त ज़िम्मेदारियां डाली गई हैं।

  • डेटा प्रोसेसर (Data Processor)

कोई थर्ड पार्टी जो डेटा फिड्यूशरी की तरफ से डेटा प्रोसेस करती है, जैसे क्लाउड सर्विस प्रोवाइडर।

  • डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड ऑफ इंडिया (DPBI)

एक स्वतंत्र सरकारी बॉडी जो इस कानून को लागू करेगी, लोगों की शिकायतें सुनेगी और नियम तोड़ने पर जुर्माना लगाएगी।

DPDP Act 2023 का दायरा कितना बड़ा है?

यह कानून भारत में मौजूद हर डिजिटल पर्सनल डेटा पर लागू होता है। चाहे डेटा सीधे डिजिटल रूप में लिया गया हो या पहले कागज़ पर हो और बाद में डिजिटल बनाया गया हो-दोनों पर यह लागू होगा।

इतना ही नहीं, विदेशी कंपनियां जो भारतीय यूजर्स को सर्विस देती हैं, वे भी इसके दायरे में आती हैं।
हालांकि, कुछ खास परिस्थितियों में सरकारी एजेंसियों को सीमित छूट दी गई है।

आम यूजर के अधिकार (Rights of Data Principals)

DPDP Act 2023 की सबसे बड़ी ताकत यही है कि यह आम यूजर को उसके डेटा का मालिक बनाता है।

1. सूचना का अधिकार

आपको यह जानने का पूरा हक है कि आपका डेटा क्यों लिया जा रहा है और उसका इस्तेमाल किस काम के लिए होगा। कंपनियों को आपको साफ और समझने वाली भाषा में नोटिस देना होगा।

2. सहमति का अधिकार

आपकी अनुमति के बिना आपका डेटा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
और यह सहमति:

  • पूरी तरह आपकी मर्जी से हो
  • साफ-साफ बताई गई हो
  • किसी शर्त में फंसी हुई न हो

सबसे ज़रूरी बात-आप कभी भी अपनी सहमति वापस ले सकते हैं।

3. सुधार और मिटाने का अधिकार

अगर आपका डेटा गलत है, तो आप उसे ठीक करवाने की मांग कर सकते हैं।
और अगर कोई डेटा अब ज़रूरी नहीं है, तो आप उसे डिलीट करने के लिए कह सकते हैं-इसे ही “Right to be Forgotten” कहा जाता है।

4. शिकायत करने का अधिकार

अगर कोई कंपनी आपकी बात नहीं सुन रही:

  • पहले आप उसी कंपनी में शिकायत कर सकते हैं
  • और अगर समाधान नहीं मिलता, तो डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड ऑफ इंडिया (DPBI) के पास जा सकते हैं

5. नॉमिनी का अधिकार

आप किसी व्यक्ति को नॉमिनी बना सकते हैं, जो आपकी मृत्यु या असमर्थता की स्थिति में आपके डेटा से जुड़े अधिकार संभालेगा।

यह भी पढ़े:- डिजिटल डिटॉक्स क्या है? स्क्रीन टाइम और मानसिकस्वास्थ्य पर टेक्नोलॉजी का प्रभाव

बच्चों के डेटा के लिए खास सुरक्षा

18 साल से कम उम्र के बच्चों का डेटा इस्तेमाल करने के लिए माता-पिता की वेरिफायबल सहमति ज़रूरी होगी।

बच्चों की:

  • ट्रैकिंग
  • प्रोफाइलिंग
  • या बिहेवियर मॉनिटरिंग

की अनुमति नहीं होगी।

यह सब कब से पूरी तरह लागू होगा?

ये सारे अधिकार 2027 तक पूरी तरह लागू हो जाएंगे। लेकिन कंपनियां अभी से अपनी तैयारी शुरू कर चुकी हैं।

उदाहरण के लिए: अगर आपके पास फेसबुक या इंस्टाग्राम अकाउंट है, तो आने वाले समय में आप आसानी से अपना डेटा डिलीट करने या उसका इस्तेमाल रोकने की रिक्वेस्ट कर पाएंगे।

कंपनियों की ज़िम्मेदारियां (Obligations of Data Fiduciaries)

DPDP Act 2023 सिर्फ यूजर्स को अधिकार ही नहीं देता, बल्कि कंपनियों पर सख्त ज़िम्मेदारियां भी डालता है। अब कोई भी कंपनी यह नहीं कह सकती कि “डेटा तो सब लेते हैं।” कानून साफ करता है कि डेटा लेना आसान है, लेकिन उसे संभालना एक बड़ी जिम्मेदारी है।

1. कंसेंट और नोटिस देना

किसी भी यूजर से डेटा लेने से पहले कंपनी को साफ, सरल और समझने वाली भाषा में बताना होगा कि:

  • डेटा क्यों लिया जा रहा है
  • उसका इस्तेमाल किस लिए होगा

यूजर की सहमति लेना ज़रूरी है। हालांकि कुछ खास मामलों में-जैसे कानूनी मजबूरी या इमरजेंसी-बिना कंसेंट के डेटा प्रोसेस किया जा सकता है।

2. डेटा सिक्योरिटी की जिम्मेदारी

कंपनियों को आपके डेटा की सुरक्षा के लिए मजबूत टेक्निकल उपाय अपनाने होंगे, जैसे एन्क्रिप्शन और सेफ सर्वर। अगर कभी डेटा लीक या हैक होता है, तो:

  • 72 घंटे के अंदर
  • डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड (DPBI)
  • और प्रभावित यूजर

दोनों को जानकारी देना अनिवार्य होगा।

3. डेटा को जरूरत से ज़्यादा समय तक नहीं रखना

कंपनियां आपका डेटा अनंत समय तक स्टोर नहीं कर सकतीं। जैसे ही डेटा की जरूरत खत्म होती है, उसे डिलीट करना होगा। और अगर यूजर खुद डेटा हटाने की रिक्वेस्ट करता है, तो कंपनी को उस पर कार्रवाई करनी पड़ेगी।

4. डेटा को भारत से बाहर भेजना

कंपनियां भारतीय यूजर्स का डेटा विदेश भेज सकती हैं, लेकिन सरकार कुछ देशों को ब्लैकलिस्ट कर सकती है, जहां डेटा भेजना मना होगा।

5. बड़े प्लेटफॉर्म्स (SDF) की अतिरिक्त जिम्मेदारियां

जो कंपनियां बहुत बड़ी मात्रा में डेटा संभालती हैं-जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स-उन्हें Significant Data Fiduciary (SDF) माना जाएगा। इन पर अतिरिक्त नियम लागू होंगे:

  • डेटा प्रोटेक्शन ऑफिसर की नियुक्ति
  • डेटा प्रोटेक्शन इम्पैक्ट असेसमेंट
  • रेगुलर ऑडिट

सरकार 2026 में SDF की आधिकारिक लिस्ट जारी कर सकती है।

6. कंसेंट मैनेजर की भूमिका

कंसेंट मैनेजर ऐसे थर्ड-पार्टी प्लेटफॉर्म होंगे, जो यूजर्स की सहमति को मैनेज करेंगे।
ये प्लेटफॉर्म नवंबर 2026 से रजिस्टर होना शुरू होंगे, ताकि यूजर एक ही जगह से अपनी डेटा परमिशन कंट्रोल कर सके।

कुल मिलाकर, ये सभी नियम कंपनियों को ज़्यादा पारदर्शी और जिम्मेदार बनाते हैं। छोटी कंपनियों पर भी असर पड़ेगा, लेकिन कानून का सबसे बड़ा फोकस बड़े डेटा-हैंडलर्स पर है।

डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड ऑफ इंडिया (DPBI)

DPDP Act को लागू करने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड ऑफ इंडिया (DPBI) की है।
यह एक स्वतंत्र संस्था होगी, बिल्कुल RBI या SEBI की तरह।

DPBI के मुख्य काम होंगे:

  • यूजर्स की शिकायतें सुनना और फैसला देना
  • डेटा उल्लंघन की जांच करना
  • नियम तोड़ने पर पेनाल्टी लगाना
  • कंपनियों के लिए गाइडलाइंस जारी करना
  • अपील ट्रिब्यूनल के साथ काम करना

नवंबर 2025 से बोर्ड का गठन शुरू हो चुका है और 2026 में यह पूरी तरह ऑपरेशनल हो जाएगा।
आम यूजर सीधे DPBI के पास शिकायत दर्ज कर सकते है ।

उल्लंघन और भारी पेनाल्टी

DPDP Act को हल्के में लेना कंपनियों के लिए बहुत महंगा पड़ सकता है। कानून में कड़ी आर्थिक सज़ा तय की गई है:

  • सामान्य उल्लंघन पर: 50 करोड़ रुपये तक जुर्माना
  • गंभीर उल्लंघन (जैसे बच्चों के डेटा का दुरुपयोग): 250 करोड़ रुपये तक
  • डेटा ब्रीच की जानकारी न देने पर: 200 करोड़ रुपये तक

ये पेनाल्टी मई 2027 से लागू होंगी, लेकिन कंपनियां अभी से कंप्लायंस पर काम शुरू कर चुकी हैं।
इससे एक तरफ कंपनियों में डर पैदा होता है और दूसरी तरफ यूजर्स को सुरक्षा मिलती है।

2026 के लेटेस्ट अपडेट्स

फरवरी 2026 तक DPDP Act से जुड़े कई अहम अपडेट सामने आ चुके हैं:

  • रूल्स का नोटिफिकेशन

13 नवंबर 2025 को DPDP Rules 2025 जारी हुए, जिनसे कानून को ज़मीन पर लागू करने का रास्ता साफ हुआ।

  • चरणबद्ध लागू होना (Phased Implementation)
    • तुरंत: परिभाषाएं और DPBI का गठन
    • 1 साल (नवंबर 2026): कंसेंट मैनेजर का रजिस्ट्रेशन
    • 18 महीने (मई 2027): सभी अधिकार, नोटिस सिस्टम और ब्रीच रिपोर्टिंग पूरी तरह लागू
  • SDF की पहचान

सरकार 2026 में बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को SDF घोषित कर सकती है।

  • आउटसोर्सिंग में राहत

अमेरिकी और विदेशी कंपनियों के लिए भारत में आउटसोर्सिंग आसान रखी गई है, कोई अतिरिक्त पाबंदी नहीं।

  • ग्लोबल स्टैंडर्ड से मेल

यह कानून GDPR जैसा है, लेकिन भारतीय कंपनियों के लिए ज्यादा सरल बनाया गया है।

EY और Hogan Lovells जैसी बड़ी रिपोर्ट्स भी मानती हैं कि यह कानून भारत में डिजिटल ट्रस्ट को मजबूत करेगा और यूजर्स को ज्यादा सुरक्षित बनाएगा।

आम यूजर पर प्रभाव: आपकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में क्या बदलेगा?

आम लोगों के लिए DPDP Act 2023 किसी बड़े बदलाव से कम नहीं है। यह कानून सीधे आपकी डेली डिजिटल लाइफ को प्रभावित करता है-चाहे आप ऑनलाइन शॉपिंग करते हों, सोशल मीडिया चलाते हों या बैंकिंग ऐप्स इस्तेमाल करते हों।

रोज़मर्रा के कुछ आसान उदाहरण

  • ऑनलाइन शॉपिंग

अब अमेज़न जैसी कंपनियों को साफ-साफ बताना होगा कि आपका डेटा क्यों लिया जा रहा है और कैसे इस्तेमाल होगा। अगर आप चाहें, तो आप अपना पुराना डेटा डिलीट करने की रिक्वेस्ट भी कर सकते हैं।

  • सोशल मीडिया

फेसबुक या इंस्टाग्राम पर अब ऐड दिखाने के लिए आपकी सहमति ज़रूरी होगी।
बिना वजह की ट्रैकिंग और प्रोफाइलिंग सीमित की जाएगी।

  • बैंकिंग और फाइनेंस

बैंक और फाइनेंशियल ऐप्स को आपके पैसों से जुड़ा डेटा ज़्यादा सुरक्षित रखना होगा।
अगर कभी डेटा लीक होता है, तो आपको इसकी जानकारी देना उनकी ज़िम्मेदारी होगी।

  • सरकारी सेवाएं

आधार जैसी संवेदनशील जानकारी की सुरक्षा पर खास ध्यान दिया जाएगा।
हालांकि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मामलों में सरकार को कुछ सीमित छूट दी गई है।

  • बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा

बच्चों के डेटा पर अब माता-पिता का कंट्रोल पहले से कहीं ज़्यादा मजबूत होगा।

लेकिन एक चुनौती भी है…

सबसे बड़ी समस्या है जागरूकता की कमी। अगर यूजर को अपने अधिकार ही नहीं पता होंगे, तो कानून का पूरा फायदा नहीं मिल पाएगा। अच्छी बात यह है कि कंपनियां अब “कंसेंट” बटन और प्राइवेसी नोटिस को ज़्यादा साफ और समझने योग्य बना रही हैं।

GDPR से तुलना: DPDP कितना अलग है?

अक्सर लोग पूछते हैं-क्या DPDP, यूरोप के GDPR जैसा ही है? जवाब है: हां, लेकिन पूरी तरह नहीं।

समानताएं

  • दोनों में यूजर की सहमति ज़रूरी
  • डेटा से जुड़े अधिकार
  • नियम तोड़ने पर भारी पेनाल्टी

मुख्य अंतर

  • DPDP ज्यादा सरल है

इसमें सिर्फ 18 सेक्शन हैं, जबकि GDPR में 99 क्लॉजेस हैं।

  • डेटा लोकलाइजेशन नहीं

DPDP में डेटा को भारत में ही रखने की मजबूरी नहीं है।

  • DPIA सिर्फ बड़े प्लेटफॉर्म्स के लिए

GDPR में सभी के लिए, DPDP में सिर्फ SDF के लिए।

  • बच्चों के डेटा पर ज्यादा फोकस
  • पेनाल्टी सिस्टम अलग

DPDP में फिक्स्ड रकम, GDPR में कंपनी के टर्नओवर के हिसाब से।

कुल मिलाकर, DPDP को भारत की डिजिटल इकॉनमी और स्टार्टअप्स को ध्यान में रखकर बनाया गया है, जबकि GDPR थोड़ा ज़्यादा सख्त है।

FAQs: आम लोगों के सवाल, आसान जवाब

1.     DPDP Act कब से लागू होगा?

यह चरणबद्ध तरीके से लागू हो रहा है और पूरी तरह मई 2027 तक लागू होगा।

2.     मेरा डेटा सुरक्षित कैसे रहेगा?

कंपनियों को मजबूत सुरक्षा उपाय अपनाने होंगे और ब्रीच होने पर आपको सूचना देनी होगी।

3.     कंसेंट क्या होती है?

आपकी साफ और स्पष्ट अनुमति। आप इसे कभी भी वापस ले सकते हैं।

4.     SDF क्या होता है?

वे बड़ी कंपनियां जो बहुत ज्यादा यूजर डेटा संभालती हैं, जैसे गूगल या फेसबुक।

5.     शिकायत कहां करें?

पहले कंपनी से, समाधान न मिले तो DPBI से।

6.     क्या विदेशी कंपनियां भी इसके दायरे में हैं?

हां, अगर वे भारतीय यूजर्स को सर्विस देती हैं।

7.     पेनाल्टी कितनी हो सकती है?

उल्लंघन के अनुसार 50 करोड़ से 250 करोड़ रुपये तक।

8.     बच्चों का डेटा कैसे सुरक्षित होगा?

माता-पिता की सहमति के बिना बच्चों का डेटा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

9.     सरकार को छूट क्यों है?

राष्ट्रीय सुरक्षा और पब्लिक इंटरेस्ट जैसे मामलों के लिए।

10.  किसी कंपनी का कंप्लायंस कैसे चेक करें?

उसकी प्राइवेसी पॉलिसी और कंसेंट सेटिंग्स देखें।

ऊपर की सभी नियमों को देखते हुये यही निष्कर्ष निकलता है कि DPDP Act 2023 भारत को डेटा प्राइवेसी के मामले में एक मजबूत दिशा देता है। अब आप और हम जैसे आम यूजर सिर्फ “डेटा देने वाला” नहीं, बल्कि अपने डेटा का मालिक है। कंपनियां पहले से ज़्यादा जवाबदेह होंगी और यूजर्स को ज़्यादा सुरक्षा मिलेगी।

2026 के अपडेट्स के साथ यह कानून धीरे-धीरे ज़मीन पर लागू हो रहा है। ज़रूरत सिर्फ एक चीज़ की है- जागरूक रहने की और अपने अधिकारों का सही इस्तेमाल करने की

जब आपका डेटा सुरक्षित होगा, तभी डिजिटल दुनिया सच में बेहतर और भरोसेमंद बनेगी।

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